आज फिर दिल्ली के मुखर्जीनगर में एक UPSC की तयारी कर रहे स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया! एक और सपनों-अपेक्षाओं के दबाव में डूब कर मौत!
जब भी ऐसी ख़बरें आती है, इन इलाकों में स्टूडेंट्स के संघर्ष को मसहूस कर उनसे सहानुभूति होने लगती है! समाज,उनके अपने परिजन तक उनकी भावना, उनके अंदर के तनाव,उथल-पुथल को नहीं समझ पाते हैं!
कुछ महीने पहले मुखर्जी नगर गया था! वहाँ चारों ओर स्टूडेंट्स और उनकी चेहरे देख कर एस्पिरेंट्स का डायलॉग याद आ गया-"मेहनत को कोई नहीं देखेगा,लोग आएंगे फेल्योर का मेडल डाल देंगे और बोलेंगे सिंसियर नहीं था तो यूपीएससी नहीं कर पाया"
यहाँ पटना, से लेकर दिल्ली और देश के कोने कोने में कठिन हालात में रहकर जीवन का महीनों देने वाले अधूरे सफर की भावुक-सच कहानी लाइव दिखती है! रांझना फ़िल्म का वह संवाद याद आता हैं-"ये तुम्हारा प्यार है या UPSC का एग्जाम जो 10 एटेम्पट के बाद भी क्लियर नहीं हो रहा है "
राजपाल से द्वारपाल के नौकरी पाने की परीक्षा सिर्फ़ सफलता की नही कई सपनों के टूटने-बनने का भी यह इलाका है। हालाँकि कुछ निराशा की मिसाल के साथ अनगिनत सफल और संघर्ष की कई प्रेरणादायक कहानिया भ हैं! यहाँ के बच्चे जीवन की परीक्षा के सबक़ लेकर जरूर निकलते हैं।
लेकिसोशल प्रेशर के डिलेमा से निकलना होगा! इसका स्थायी हल तलाशना होगा। समाज और परिजन को इसके लिए पहले पहल लेनी होगी। उन्हें तय करना होगा कि क्या उन्हें अपने बच्चों से हर क़ीमत पर समाज के बनाए पारमीटर के हिसाब से ही सफलता चाहिए भले वह क़ीमत मौत ही क्यों न हो। या वह बच्चों को व्यावहारिक धरातल पर ख़ुद के लाइट रास्ता बनाने की अनुमति देंगे जिसमें जीवन हो।